रवींद्र त्रिपाठी
हिंदी की दुनिया में तीन बड़े लेखक संगठन हैं- प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति मंच। कहने को तीनों वामपंथी लेखक संगठन हैं लेकिन दरअसल तीनों अध्यापक पंथी लेखक संगठन हैं क्योंकि तीनों पर हिंदी के अध्यापक काबिज हैं। इन सभी संगठनों के महत्वपूर्ण पदों पर – अध्यक्ष, महासचिव वगैरह पर हिंदी के अध्यापक बैठे होते हैं। यानी लेखकों, कवियों, कथाकारों , नाटककारों पर हिंदी का अध्यापक भारी है। कम से कम लेखक संगठनों में।
वैसे इन सभी लेखक संगठनों में उपाध्यक्ष वगैरह जैसे अमहत्वपूर्ण पद लेखकों को दे दिए जाते हैं ताकि वे भी अपने को हैसियत वाला समझें। लेकिन वे अपने को हैसियत वाला समझते रहें, लेकिन दरअसल हकीकत यही है कि उनकी कोई हैसियत नहीं होती । उपाध्यक्ष जैसे पदों पर बैठे लेखक अपने-अपने संगठन की नीति तय नहीं कर सकते, कोई बयान नहीं दे सकते, कोई फैसला नहीं ले सकते। अगर ऐसा कुछ करने की कोशिश की तो या तो संगठन के बाहर कर दिए जाते हैं या उपाध्यक्ष पद से हटाकर संगठन के भीतर विशेष आमंत्रित बना दिए जाते हैं। वैसे कहने को संघियों/ भाजपायियों का भी एक लेखक संगठन है। पता नहीं क्या नाम है उसका? वहां भी हिंदी अध्यापक ही काबिज है। पर वहां थोडा सा फर्क है। वहां उपाध्यक्ष वगैरह मामूली पदों भी कोई लेखक नहीं है। वो इसलिए लिए इस संगठन में कोई लेखक है ही नहीं। वहां भी हिंदी के अध्यापक ही अपने को लेखक मानते है, भले ही उन्होंने कुछ न लिखा हो। जहां तक समाजवादी लेखक संघ का सवाल है वो बन ही नहीं सकता । समाजवादी जब राजनीति में अपना संगठन नहीं बना पाए तो लेखकों का कैसे बना सकते हैं?
इतिहास में कई तरह के तख्ता पलट की चर्चा होती है। लेकिन लेखक संगठनों में हिंदी ( और ऊर्दू के भी) अध्यापकों ने जो तख्ता पलट किया है उसके बारे में कहीं चर्चा नहीं होती। अब समय आ गया है कि उनपर चर्चा हो। हिंदी के अध्यापको ने और कुछ किया हो या न किया हो, लेखक संघों पर कब्जा करके ये दिखा दिया है कि वक्त पड़ने पर वे भी साहित्य की दुनिया में कमाल का काम कर सकते हैं।
असल में लेखक संघों में अप्रासंगिक होने में लेखकों का भी हाथ है। जो सच्चा लेखक है उसका वक्त तो लेखन में ही लगेगा। फिर उसे संगठन की बैठक के लिए चिट्टी लिखने का वक्त कहां से मिलेगा? उसके पास पोस्टर बनाने, उसे दिवारों पर चिपकवाने ( चिपकाने का काम तो मजदूर करते हैं) के लिए भी वक्त नहीं मिलेगा। उसके पास पार्टी दफ्तर जाकर पार्टी-लाइन जानने का भी वक्त नहीं है। ऐसे में हिंदी का अध्यापक काम आता है क्योंकि उसके पास वक्त ही वक्त है। चूंकि वो लिखता नहीं है इसलिए लेखक संघ का काम जम के करता है। आखिर जब वो बैठक आयोजित करने के लिए चिट्ठी लिखेगा, संगठन का दफ्तर शाम को खोलेगा, दरी चादर बिछवाएगा औऱ रात में दफ्तर बंद करेगा, तो संगठन में पद भी लेगा। इतना तो वाजिब हक बनता है। जब वो लेखक संगठन का अध्यक्ष नहीं बन सकता तो इतना काम क्यों करेगा? कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में कुछ अध्यापक लिखने पढने वाले भी होते हैं। पर वे भी लंखक संघों के अध्यक्ष से डरे-सहमें रहते हैं कि पता नहीं उसकी किस रचना को कुलीनतावादी या प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जाए।
फिर एक बात और है। जब लेखक की समाज में हैसियत नहीं रह गई है तो लेखक संगठन के भीतर क्यों हैसियत रहे? आखिर प्रकाशक भी ये देखता है किताब खरीदवाने का काम तो अध्यापक करता है। वही किताबों की खरीदनेवाली समिति का अध्यक्ष होता है। लेखक किताबें लिखता है लेकिन किताब खरीदवाने का काम हिंदी का विभागाध्यक्ष या प्रोफेसर करता कराता है। इसलिए प्रकाशक भी उसको ही तरजीह देता है। हिंदी के हर बड़े प्रकाशक का सलाहकार हिंदी का कोई प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष होता है, लेखक नहीं। हां, शर्त ये है कि उस प्रोफेसर को किताबों की खरीद की किसी कमेटी का सदस्य या चैयरमैन होना चाहिए।
हालत ये है कि हिंदी के लेखक को अपनी किताब छपवाने के लिए दर दर भटकाना होता है। उसकी किताब छपने के लिए दो- तीन साल का वक्त लग सकता है। अगर किताब छप भी जाए तो रायल्टी मिलने में कई साल लग जाते हैं और रायल्टी मिलती भी है तो वो इतनी कम होती है उसमें पढने के लायक किताबें भी नहीं खरीद सकता है। ऐसा शख्स किसी लेखक संगठन का अध्यक्ष कैसे बन सकता है?
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