इधर हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को एक मुश्किल का सामना कर पड़ रहा है। वैसे मुश्किल बड़ी नहीं है लेकिन लगातार बड़ी होती जा रही है। वो मुश्किल है- विशेषणों की कमी। खासकर साहित्यकारों के बारे में विशेषणों की उपयुक्तता का अभाव। हिंदी में आमतौर पर पत्रिकाओं में किसी लेखक की रचना छापने पर उसके परिचय में कोई न कोई विशेषण लगाने का रिवाज है। जैसे- फलां हिंदी के `वरिष्ठ कवि’ हैं या `प्रमुख कहानीकार’ हैं या `युवा आलोचक’ हैं, आदि आदि। दिक्कत ये हो रही है कि कई बार पत्रिका के एक ही अंक में कई उम्रदराज लेखकों की रचनाएं छापनी पड़ती हैं। लेकिन अगर सबके परिचय में `वरिष्ठ लेखक’ या `वरिष्ठ कवि’ ही लिखा जाए तो संपादक को ये लगने लगता है कि उसके पास विशेषणों की कमी पड़ गई है। फिर ज्यादा उम्र के वरिष्ठ लेखकों को लगने लगता है कि उनके साथ ज्यादती हो रही है। जैसे अस्सी साल के कवि को लगता है कि जब साठ साल वाले कवि को भी `वरिष्ठ’ कवि बता दिया गया तो उसके अस्सी साल का होने का मतलब क्या रहा? ये तो उसकी वरिष्ठता की अवमानना हुई।
लेकिन संपादक के सामने समस्या है कि वो साठ के ऊपर के कवि, कथाकार या आलोचक के बारे में कौन सा विशेषण लगाए? विशेषण न लगाए तो लेखक के कुपित होने की आशंका है। साहित्यकारों के साथ मुश्किल ये है चालीस के ऊपर पहुंचने पर ही वे अपने को वरिष्ठ समझने लगते हैं। अगर किसी संपादक ने परिचय लिखते वक्त पैंतालीस साल के लेखक को `सुपरिचित’ या `प्रमुख’ के विशेषण से नवाज दिया तो नाराजगी का खतरा मंडराने लगता है। पैंतालीस वर्षीय वो कवि, आलोचक या कहानीकार ये समझने लगता है कि उसके खिलाफ साजिश की जा रही है। उसकी वरिष्ठता को नजरअंदाज किया जा रहा है।आखिर उसने धूप में तो बाल सफेद किए नहीं है। चालीस से पचास के बीच का लेखक अधिक से अधिक `विशिष्ट लेखक’ कहलाने पर संतोष कर सकता है। लेकिन पचास के ऊपर होते ही वो `वरिष्ठ’ के अलावा कुछ और कहलाने पर तैयार नहीं होता।
मोटे तौर पर हिंदी का साहित्यकार या तो `युवा’ कहलाना पसंद करता है या `वरिष्ठ’। पहली रचना छपने पर तो कोई `उदीयमान’ कहलाना पसंद कर ले लेकिन दूसरी रचना छपने के वक्त वो ये चाहता है कि उसे `युवा’ कहा जाए। कभी कभी ऐसा भी होता है कि चालीस की उम्र वाला कवि या कहानीकार चाहता है कि किसी पत्रिका के `युवा कविता विशेषांक’ या `युवा कहानी विशेषांक’ में भी उसकी रचना आ जाए। ऐसे मौके पर वो अपने को `युवा’ महसूस करने लगता है। चूंकि उस वक्त वो वरिष्ठता वाली लाइन में सबसे पीछे होता है इसलिए जरूरत पड़ने पर लाइन तोड़ने के लिए भी तैयार रहता है। जहां तक आलोचकों का सवाल है मौका पड़ने पर वे तो पचास साल के होने तक युवा कहलाने को तैयार हो जाते हैं। आकस्मिक नहीं कि पचास के पेटे में पहुंचे कुछ ऐसे ही कुछ `युवा’ आलोचकों ने `देवी शंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ लेते वक्त गर्व का अनुभव किया। हालांकि इस पुरस्कार की स्थापना युवा आलोचकों के लिए हुई थी।
लेकिन मूल सवाल वही कि संपादक क्या करे? अगर वो चालीस-पचास की उम्र से ऊपर के सभी लेखकों को वरिष्ठता के विशेषण से विभूषित करता है खुद उसे अपने ऊपर ग्लानि होने लगती है कि वो क्या कर रहा है! उसे डर लगने लगता है कि कहीं साहित्यिक बिरादरी वाले उसके ऊपर हंसने न लगें कि वो रेवड़ी बांटने की तरह लेखकों को वरिष्ठता का खिताब दिए जा रहा है। लेकिन अगर वो किसी के परिचय में कोई विशेषण न लगाए तो इसका खतरा रहता है कि कहीं वरिष्ठ लेखक इस बात पर न खफा हो जाएं कि संपादक न उनके उम्र का लिहाज कर रहा है न साहित्यिक समाज में उनकी हैसियत का। हिंदी में लेखन से पैसा तो मिलता नहीं है। बस जल्दी से जल्दी, यानी चालीस के बाद वरिष्ठता का खिताब मिल जाता है। जब संपादक इसका भी ध्यान नहीं रखे तो उसके मांगने पर रचनाएं क्यों भेजी जाएं? इन्हीं बातों को सोचते हुए संपादक धड़धड़ `वरिष्ठ’ वाला ठप्पा लगाना शुरू कर देता है। वो उन्हीं लेखकों के आगे `सुपरिचित’ या `प्रमुख’ का ठप्पा लगाता है जिन्होंने बिना मांगे अपनी रचनाएं भेज दी हैं। वे नाराज हों तो हों। आखिर ये भी दिखाना है संपादक के कोश में और भी विशेषण हैं।
हालांकि संपादक इस दौरान कुछ विकल्पों पर विचार करता है। उसे लगता है कि अस्सी साल के लेखक को `अति वरिष्ठ’ लिख दे। लेकिन फिर सोचता है कि कहीं सत्तर साल वाले लेखक इससे न नाराज हो जाएं। सत्तर साल वाला लेखक शिकायती लहजे में कह सकता है कि क्या दस साल की वजह से ही वो `अति वरिष्ठ’ होने से रह गया? ऐसे में संपादक क्या करे? इधर कुआं उधर खाई। क्या आपके पास कोई सुझाव है?
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