मंगलवार, 23 नवंबर 2010

साहित्य संपादक की मुश्किल

इधर हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को एक मुश्किल का सामना कर पड़ रहा है। वैसे मुश्किल बड़ी नहीं है लेकिन लगातार बड़ी होती जा रही है। वो मुश्किल है- विशेषणों की कमी। खासकर साहित्यकारों के बारे में विशेषणों की उपयुक्तता का अभाव। हिंदी में आमतौर पर पत्रिकाओं में किसी लेखक की रचना छापने पर उसके परिचय में कोई न कोई विशेषण लगाने का रिवाज है। जैसे- फलां हिंदी के `वरिष्ठ कवि’ हैं या `प्रमुख कहानीकार’ हैं या `युवा आलोचक’ हैं, आदि आदि। दिक्कत ये हो रही है कि कई बार पत्रिका के एक ही अंक में कई उम्रदराज लेखकों की रचनाएं छापनी पड़ती हैं। लेकिन अगर सबके परिचय में `वरिष्ठ लेखक’ या `वरिष्ठ कवि’ ही लिखा जाए तो संपादक को ये लगने लगता है कि उसके पास विशेषणों की कमी पड़ गई है। फिर ज्यादा उम्र के वरिष्ठ लेखकों को लगने लगता है कि उनके साथ ज्यादती हो रही है। जैसे अस्सी साल के कवि को लगता है कि जब साठ साल वाले कवि को भी `वरिष्ठ’ कवि बता दिया गया तो उसके अस्सी साल का होने का मतलब क्या रहा? ये तो उसकी वरिष्ठता की अवमानना हुई।
लेकिन संपादक के सामने समस्या है कि वो साठ के ऊपर के कवि, कथाकार या आलोचक के बारे में कौन सा विशेषण लगाए? विशेषण न लगाए तो लेखक के कुपित होने की आशंका है। साहित्यकारों के साथ मुश्किल ये है चालीस के ऊपर पहुंचने पर ही वे अपने को वरिष्ठ समझने लगते हैं। अगर किसी संपादक ने परिचय लिखते वक्त पैंतालीस साल के लेखक को `सुपरिचित’ या `प्रमुख’ के विशेषण से नवाज दिया तो नाराजगी का खतरा मंडराने लगता है। पैंतालीस वर्षीय वो कवि, आलोचक या कहानीकार ये समझने लगता है कि उसके खिलाफ साजिश की जा रही है। उसकी वरिष्ठता को नजरअंदाज किया जा रहा है।आखिर उसने धूप में तो बाल सफेद किए नहीं है। चालीस से पचास के बीच का लेखक अधिक से अधिक `विशिष्ट लेखक’ कहलाने पर संतोष कर सकता है। लेकिन पचास के ऊपर होते ही वो `वरिष्ठ’ के अलावा कुछ और कहलाने पर तैयार नहीं होता।
मोटे तौर पर हिंदी का साहित्यकार या तो `युवा’ कहलाना पसंद करता है या `वरिष्ठ’। पहली रचना छपने पर तो कोई `उदीयमान’ कहलाना पसंद कर ले लेकिन दूसरी रचना छपने के वक्त वो ये चाहता है कि उसे `युवा’ कहा जाए। कभी कभी ऐसा भी होता है कि चालीस की उम्र वाला कवि या कहानीकार चाहता है कि किसी पत्रिका के `युवा कविता विशेषांक’ या `युवा कहानी विशेषांक’ में भी उसकी रचना आ जाए। ऐसे मौके पर वो अपने को `युवा’ महसूस करने लगता है। चूंकि उस वक्त वो वरिष्ठता वाली लाइन में सबसे पीछे होता है इसलिए जरूरत पड़ने पर लाइन तोड़ने के लिए भी तैयार रहता है। जहां तक आलोचकों का सवाल है मौका पड़ने पर वे तो पचास साल के होने तक युवा कहलाने को तैयार हो जाते हैं। आकस्मिक नहीं कि पचास के पेटे में पहुंचे कुछ ऐसे ही कुछ `युवा’ आलोचकों ने `देवी शंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ लेते वक्त गर्व का अनुभव किया। हालांकि इस पुरस्कार की स्थापना युवा आलोचकों के लिए हुई थी।
लेकिन मूल सवाल वही कि संपादक क्या करे? अगर वो चालीस-पचास की उम्र से ऊपर के सभी लेखकों को वरिष्ठता के विशेषण से विभूषित करता है खुद उसे अपने ऊपर ग्लानि होने लगती है कि वो क्या कर रहा है! उसे डर लगने लगता है कि कहीं साहित्यिक बिरादरी वाले उसके ऊपर हंसने न लगें कि वो रेवड़ी बांटने की तरह लेखकों को वरिष्ठता का खिताब दिए जा रहा है। लेकिन अगर वो किसी के परिचय में कोई विशेषण न लगाए तो इसका खतरा रहता है कि कहीं वरिष्ठ लेखक इस बात पर न खफा हो जाएं कि संपादक न उनके उम्र का लिहाज कर रहा है न साहित्यिक समाज में उनकी हैसियत का। हिंदी में लेखन से पैसा तो मिलता नहीं है। बस जल्दी से जल्दी, यानी चालीस के बाद वरिष्ठता का खिताब मिल जाता है। जब संपादक इसका भी ध्यान नहीं रखे तो उसके मांगने पर रचनाएं क्यों भेजी जाएं? इन्हीं बातों को सोचते हुए संपादक धड़धड़ `वरिष्ठ’ वाला ठप्पा लगाना शुरू कर देता है। वो उन्हीं लेखकों के आगे `सुपरिचित’ या `प्रमुख’ का ठप्पा लगाता है जिन्होंने बिना मांगे अपनी रचनाएं भेज दी हैं। वे नाराज हों तो हों। आखिर ये भी दिखाना है संपादक के कोश में और भी विशेषण हैं।
हालांकि संपादक इस दौरान कुछ विकल्पों पर विचार करता है। उसे लगता है कि अस्सी साल के लेखक को `अति वरिष्ठ’ लिख दे। लेकिन फिर सोचता है कि कहीं सत्तर साल वाले लेखक इससे न नाराज हो जाएं। सत्तर साल वाला लेखक शिकायती लहजे में कह सकता है कि क्या दस साल की वजह से ही वो `अति वरिष्ठ’ होने से रह गया? ऐसे में संपादक क्या करे? इधर कुआं उधर खाई। क्या आपके पास कोई सुझाव है?

सोमवार, 15 नवंबर 2010

बेदखल लेखक

रवींद्र त्रिपाठी

हिंदी की दुनिया में तीन बड़े लेखक संगठन हैं- प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति मंच। कहने को तीनों वामपंथी लेखक संगठन हैं लेकिन दरअसल तीनों अध्यापक पंथी लेखक संगठन हैं क्योंकि तीनों पर हिंदी के अध्यापक काबिज हैं। इन सभी संगठनों के महत्वपूर्ण पदों पर – अध्यक्ष, महासचिव वगैरह पर हिंदी के अध्यापक बैठे होते हैं। यानी लेखकों, कवियों, कथाकारों , नाटककारों पर हिंदी का अध्यापक भारी है। कम से कम लेखक संगठनों में।
वैसे इन सभी लेखक संगठनों में उपाध्यक्ष वगैरह जैसे अमहत्वपूर्ण पद लेखकों को दे दिए जाते हैं ताकि वे भी अपने को हैसियत वाला समझें। लेकिन वे अपने को हैसियत वाला समझते रहें, लेकिन दरअसल हकीकत यही है कि उनकी कोई हैसियत नहीं होती । उपाध्यक्ष जैसे पदों पर बैठे लेखक अपने-अपने संगठन की नीति तय नहीं कर सकते, कोई बयान नहीं दे सकते, कोई फैसला नहीं ले सकते। अगर ऐसा कुछ करने की कोशिश की तो या तो संगठन के बाहर कर दिए जाते हैं या उपाध्यक्ष पद से हटाकर संगठन के भीतर विशेष आमंत्रित बना दिए जाते हैं। वैसे कहने को संघियों/ भाजपायियों का भी एक लेखक संगठन है। पता नहीं क्या नाम है उसका? वहां भी हिंदी अध्यापक ही काबिज है। पर वहां थोडा सा फर्क है। वहां उपाध्यक्ष वगैरह मामूली पदों भी कोई लेखक नहीं है। वो इसलिए लिए इस संगठन में कोई लेखक है ही नहीं। वहां भी हिंदी के अध्यापक ही अपने को लेखक मानते है, भले ही उन्होंने कुछ न लिखा हो। जहां तक समाजवादी लेखक संघ का सवाल है वो बन ही नहीं सकता । समाजवादी जब राजनीति में अपना संगठन नहीं बना पाए तो लेखकों का कैसे बना सकते हैं?
इतिहास में कई तरह के तख्ता पलट की चर्चा होती है। लेकिन लेखक संगठनों में हिंदी ( और ऊर्दू के भी) अध्यापकों ने जो तख्ता पलट किया है उसके बारे में कहीं चर्चा नहीं होती। अब समय आ गया है कि उनपर चर्चा हो। हिंदी के अध्यापको ने और कुछ किया हो या न किया हो, लेखक संघों पर कब्जा करके ये दिखा दिया है कि वक्त पड़ने पर वे भी साहित्य की दुनिया में कमाल का काम कर सकते हैं।
असल में लेखक संघों में अप्रासंगिक होने में लेखकों का भी हाथ है। जो सच्चा लेखक है उसका वक्त तो लेखन में ही लगेगा। फिर उसे संगठन की बैठक के लिए चिट्टी लिखने का वक्त कहां से मिलेगा? उसके पास पोस्टर बनाने, उसे दिवारों पर चिपकवाने ( चिपकाने का काम तो मजदूर करते हैं) के लिए भी वक्त नहीं मिलेगा। उसके पास पार्टी दफ्तर जाकर पार्टी-लाइन जानने का भी वक्त नहीं है। ऐसे में हिंदी का अध्यापक काम आता है क्योंकि उसके पास वक्त ही वक्त है। चूंकि वो लिखता नहीं है इसलिए लेखक संघ का काम जम के करता है। आखिर जब वो बैठक आयोजित करने के लिए चिट्ठी लिखेगा, संगठन का दफ्तर शाम को खोलेगा, दरी चादर बिछवाएगा औऱ रात में दफ्तर बंद करेगा, तो संगठन में पद भी लेगा। इतना तो वाजिब हक बनता है। जब वो लेखक संगठन का अध्यक्ष नहीं बन सकता तो इतना काम क्यों करेगा? कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में कुछ अध्यापक लिखने पढने वाले भी होते हैं। पर वे भी लंखक संघों के अध्यक्ष से डरे-सहमें रहते हैं कि पता नहीं उसकी किस रचना को कुलीनतावादी या प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जाए।
फिर एक बात और है। जब लेखक की समाज में हैसियत नहीं रह गई है तो लेखक संगठन के भीतर क्यों हैसियत रहे? आखिर प्रकाशक भी ये देखता है किताब खरीदवाने का काम तो अध्यापक करता है। वही किताबों की खरीदनेवाली समिति का अध्यक्ष होता है। लेखक किताबें लिखता है लेकिन किताब खरीदवाने का काम हिंदी का विभागाध्यक्ष या प्रोफेसर करता कराता है। इसलिए प्रकाशक भी उसको ही तरजीह देता है। हिंदी के हर बड़े प्रकाशक का सलाहकार हिंदी का कोई प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष होता है, लेखक नहीं। हां, शर्त ये है कि उस प्रोफेसर को किताबों की खरीद की किसी कमेटी का सदस्य या चैयरमैन होना चाहिए।
हालत ये है कि हिंदी के लेखक को अपनी किताब छपवाने के लिए दर दर भटकाना होता है। उसकी किताब छपने के लिए दो- तीन साल का वक्त लग सकता है। अगर किताब छप भी जाए तो रायल्टी मिलने में कई साल लग जाते हैं और रायल्टी मिलती भी है तो वो इतनी कम होती है उसमें पढने के लायक किताबें भी नहीं खरीद सकता है। ऐसा शख्स किसी लेखक संगठन का अध्यक्ष कैसे बन सकता है?

रुंआसा कलावाद

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रवींद्र त्रिपाठी
                                        
ललित कला अकादेमी की सीढ़ियों पर वो चेहरा तीसरे दिन भी दिखा तो लगा कि इसे तो पहले भी कई बार देख चुका हूं। हालांकि उसके गाल पिचके हुए थे और पहले जो चेहरा रोबीला दीखता था वो दयनीय सा हो रहा था । वो सहमा सहमा भी दिख रहा था। उसका नाम कलावाद था।
 मैं पुकारा- `अरे भाई, कलावाद कैसे हो और ये क्या हाल बना रखा है?’
उसने थके थके लहजे में कहा- `नमस्कार भाई साहब। अशोक वाजपेयी से मिलने आया था। जबसे वे ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष बने हैं तबसे मिल नहीं रहे हैं। कई बार कोशिश कर चुका हूं। मगर अप्वाइंटेमेंट ही नहीं देते।फिर अचानक ही उसका चेहरा बेहद रुआंसा हो गया और रुंधे गले से उसने कहा- `बहुत थक गया हूं भाई साहब। हिंदी की दुनिया में अब मेरी कोई पूछ नहीं रही है। कोई अपने को कलावादी कहने को तैयार नहीं है। अशोक जी से काफी आशाएं थीं। लेकिन इधर बीते  कई बरसों से वे भी घास नहीं डाल रहे हैं। पहले वे हर तीन महीने पर प्रगतिशीलों और जनवादियों को चिढ़ाते हुए अपने को `कुख्यात कलावादी कहते थे। लेकिन अब तो उस  जुमले को भूल से गए हैं। अपनी दुकान तो बंद होने को है।
  इतना कहने के बाद कलावाद की आंखों से टप –टप आंसू बहने लगे। उसकी पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। हालांकि उसके दर्दे दिल का कोई इलाज मेरे पास नहीं था। लेकिन कुछ करने का जज्बा भी जोर मार रहा था, इसलिए सोचा कि क्यों न इसकी पूरी कहानी ही सुन ली जाए। शायद इसी वजह से उसका दर्द हल्का हो जाए।  पूछा- `चाय पिओगे।
उसने कहा- `हां’, और आगे जोड़ा-` अगर एक ब्रेड पकौड़ा भी खिला दें तो कृपा होगी। बहुत भूख लगी है।
  ब्रेक पकौड़ा खाने और चाय पीने के बाद कलावाद के चेहरे पर थोड़ी हरियाली आई और कहना शुरू किया- `भाई साहब, मेरे खिलाफ बहुत बड़ी साजिश रची गई है। पहले तो मुझे लगा था सोवियत संघ के पतन के बाद साम्यवाद के तो धुर्रे उड़ेंगे और प्रगतिशीलता और जनवाद की तो हिंदी में धज्जी उड़ जाएगी। उड़ भी गई। लेकिन उसका मुझे भी नुकसान हो गया। भोपाल घराने से मुझे काफी आशाएं थीं। हालांकि भोपाल घराने वाले भी अच्छे कलावादी नहीं थे। अब सोचिए, कहां आस्कर वाइल्ड जैसा शानदार और जानदार कलावादी और कहां लंबे और उबाऊ गद्य लिखनेवाले भोपाल के शाही कलावादी। फिर भी सोचता था कि चलो, मेरा नाम तो है। आज नहीं तो कल ढंग का कलावादी पैदा हो जाएगा।  लेकिन जैसे जैसे प्रगतिशीलता और जनवाद का शोर कम होने लगा अपन तो लुट गए। आज की तारीख में हिंदी में न ढंग के प्रगतिशील बचे न जनवादी।  अब अशोक वाजपेयी को ही लीजिए। आजकल जनवादी लेखक संघ की पत्रिकाओं की तारीफ करते हैं और जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष पर हुई गोष्ठी में शामिल होते हैं और  उनकी तारीफ करते हैं। मेरी तो समझ में ये नहीं आता कि जन संस्कृति मंच वालों पर हंसूं या अपने ऊपर रोऊं। लेकिन चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूजा चाकू पर, कटना तो तरबूजे को ही है। अशोक जी जन संस्कृति मंच वालों की तारीफ करें या जन संस्कृति मंच वाले अशोक जी की, दोनों ही हालत में दुर्गति तो मेरी ही होनी ही। सोचिए जब कल के कलावादी, प्रगतिशील, जनवादी और जन संस्कृति मंच वाले एक ही साथ हैदराबादी बिरयानी खाएंगे और इंडिया इंटर नेशनल सेंटर में शाम बिताएंगे तो मैं तो कहीं का ना रहा न।
  मैंने सोचा इसे कम के काम ढाढ़स से बंधाऊं, इसलिए बोला- `यार कलावाद, इतने दुखी ना हो। संकट अकेले तुम पर ही नहीं है,  प्रगतिशीलों, जनवादियों जन संस्कृति मंच वालों पर भी है। तुम जानते नहीं कि पूरी दुनिया में विचारधारा की मृत्यु हो चुकी है।
इतना सुनते ही कलावाद क्रोधित हो गया और बोला- `ये सब बरगलानेवाली बात है। ये जो विचारधारा के अंत की जो बात है ना, वो दरअसल विचार के खिलाफ साजिश है। साहित्य और कला के खिलाफ साजिश है।  लेकिन क्या जब तब मनुष्य है,  क्या सचमुच विचार का, साहित्य का और कला का अंत हो सकता है। मैं दूसरों की तो नहीं जानता, लेकिन अपने बारे में ये कहूंगा कि मैं भी एक विचार हूं और जीवित रहूंगा। और मैं ये भी जानता हूं कि दुनिया में जब एक ही किस्म का विचार होगा तो कोई विचार नहीं होगा। इसलिए कई तरह के विचारों की जरूरत है। जिस दिन एक अच्छा कलावादी पैदा हो गया उस दिन दूसरे विचार भी उससे टकराने के लिए उठ जाएंगे। इसलिए मैं कलावाद के असली कलाकार की प्रतीक्षा में हूं।
उसके बाद कलावाद वहां से निकलकर कहीं गुम हो गया।