रवींद्र त्रिपाठी
ललित कला अकादेमी की सीढ़ियों पर वो चेहरा तीसरे दिन भी दिखा तो लगा कि इसे तो पहले भी कई बार देख चुका हूं। हालांकि उसके गाल पिचके हुए थे और पहले जो चेहरा रोबीला दीखता था वो दयनीय सा हो रहा था । वो सहमा सहमा भी दिख रहा था। उसका नाम कलावाद था।
मैं पुकारा- `अरे भाई, कलावाद कैसे हो और ये क्या हाल बना रखा है?’
उसने थके थके लहजे में कहा- `नमस्कार भाई साहब। अशोक वाजपेयी से मिलने आया था। जबसे वे ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष बने हैं तबसे मिल नहीं रहे हैं। कई बार कोशिश कर चुका हूं। मगर अप्वाइंटेमेंट ही नहीं देते।‘ फिर अचानक ही उसका चेहरा बेहद रुआंसा हो गया और रुंधे गले से उसने कहा- `बहुत थक गया हूं भाई साहब। हिंदी की दुनिया में अब मेरी कोई पूछ नहीं रही है। कोई अपने को कलावादी कहने को तैयार नहीं है। अशोक जी से काफी आशाएं थीं। लेकिन इधर बीते कई बरसों से वे भी घास नहीं डाल रहे हैं। पहले वे हर तीन महीने पर प्रगतिशीलों और जनवादियों को चिढ़ाते हुए अपने को `कुख्यात कलावादी’ कहते थे। लेकिन अब तो उस जुमले को भूल से गए हैं। अपनी दुकान तो बंद होने को है।‘
इतना कहने के बाद कलावाद की आंखों से टप –टप आंसू बहने लगे। उसकी पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। हालांकि उसके दर्दे दिल का कोई इलाज मेरे पास नहीं था। लेकिन कुछ करने का जज्बा भी जोर मार रहा था, इसलिए सोचा कि क्यों न इसकी पूरी कहानी ही सुन ली जाए। शायद इसी वजह से उसका दर्द हल्का हो जाए। पूछा- `चाय पिओगे।‘
उसने कहा- `हां’, और आगे जोड़ा-` अगर एक ब्रेड पकौड़ा भी खिला दें तो कृपा होगी। बहुत भूख लगी है।‘
ब्रेक पकौड़ा खाने और चाय पीने के बाद कलावाद के चेहरे पर थोड़ी हरियाली आई और कहना शुरू किया- `भाई साहब, मेरे खिलाफ बहुत बड़ी साजिश रची गई है। पहले तो मुझे लगा था सोवियत संघ के पतन के बाद साम्यवाद के तो धुर्रे उड़ेंगे और प्रगतिशीलता और जनवाद की तो हिंदी में धज्जी उड़ जाएगी। उड़ भी गई। लेकिन उसका मुझे भी नुकसान हो गया। भोपाल घराने से मुझे काफी आशाएं थीं। हालांकि भोपाल घराने वाले भी अच्छे कलावादी नहीं थे। अब सोचिए, कहां आस्कर वाइल्ड जैसा शानदार और जानदार कलावादी और कहां लंबे और उबाऊ गद्य लिखनेवाले भोपाल के शाही कलावादी। फिर भी सोचता था कि चलो, मेरा नाम तो है। आज नहीं तो कल ढंग का कलावादी पैदा हो जाएगा। लेकिन जैसे जैसे प्रगतिशीलता और जनवाद का शोर कम होने लगा अपन तो लुट गए। आज की तारीख में हिंदी में न ढंग के प्रगतिशील बचे न जनवादी। अब अशोक वाजपेयी को ही लीजिए। आजकल जनवादी लेखक संघ की पत्रिकाओं की तारीफ करते हैं और जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष पर हुई गोष्ठी में शामिल होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं। मेरी तो समझ में ये नहीं आता कि जन संस्कृति मंच वालों पर हंसूं या अपने ऊपर रोऊं। लेकिन चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूजा चाकू पर, कटना तो तरबूजे को ही है। अशोक जी जन संस्कृति मंच वालों की तारीफ करें या जन संस्कृति मंच वाले अशोक जी की, दोनों ही हालत में दुर्गति तो मेरी ही होनी ही। सोचिए जब कल के कलावादी, प्रगतिशील, जनवादी और जन संस्कृति मंच वाले एक ही साथ हैदराबादी बिरयानी खाएंगे और इंडिया इंटर नेशनल सेंटर में शाम बिताएंगे तो मैं तो कहीं का ना रहा न।‘
मैंने सोचा इसे कम के काम ढाढ़स से बंधाऊं, इसलिए बोला- `यार कलावाद, इतने दुखी ना हो। संकट अकेले तुम पर ही नहीं है, प्रगतिशीलों, जनवादियों जन संस्कृति मंच वालों पर भी है। तुम जानते नहीं कि पूरी दुनिया में विचारधारा की मृत्यु हो चुकी है।‘
इतना सुनते ही कलावाद क्रोधित हो गया और बोला- `ये सब बरगलानेवाली बात है। ये जो विचारधारा के अंत की जो बात है ना, वो दरअसल विचार के खिलाफ साजिश है। साहित्य और कला के खिलाफ साजिश है। लेकिन क्या जब तब मनुष्य है, क्या सचमुच विचार का, साहित्य का और कला का अंत हो सकता है। मैं दूसरों की तो नहीं जानता, लेकिन अपने बारे में ये कहूंगा कि मैं भी एक विचार हूं और जीवित रहूंगा। और मैं ये भी जानता हूं कि दुनिया में जब एक ही किस्म का विचार होगा तो कोई विचार नहीं होगा। इसलिए कई तरह के विचारों की जरूरत है। जिस दिन एक अच्छा कलावादी पैदा हो गया उस दिन दूसरे विचार भी उससे टकराने के लिए उठ जाएंगे। इसलिए मैं कलावाद के असली कलाकार की प्रतीक्षा में हूं।‘
उसके बाद कलावाद वहां से निकलकर कहीं गुम हो गया।

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